Uttam Prakash Sharma

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***Please LIKE & SHARE the post*** -----> Shirdi Sai Baba To the lotus feet of My Sai . . . Sai Satcharitra Chapter 35 (V) – English & Hindi Version - Shirdi Sai Baba *****HINDI VERSION***** काका महाजनी के सेठ (contd.) फिर शामा ने बाबा से परिचय कराय कि आप ही काका के सेठ है । बाबा कहने लगे किये उनके सेठ कैसे हो सकते है । इनके सेठ तो बड़े विचित्र है । काका इस उत्तर से सहमत हो गये । अपनी हठ छोड़कर ठक्कर ने बाबा को प्रणाम किया और वाड़े को लौट आये । मध्याह की आरती समाप्त होने के उपरान्त वे बाबा से प्रस्थान करने की अनुमति प्राप्त करने के लिये मसजिद में आये । शामा ने उनकी कुछ सिफारिश की, तब बाबा इस प्रकार बोले ः- एक सनकी मस्तिष्क वाला सभ्य पुरुष था, जो स्वस्थ और धनी भी था । शारीरिक तथा मानसिक व्यथाओं से मुक्त होने पर भी वह स्वतःही अनावश्यक चिंताओं में डूबा रहता और व्यर्थ ही यहाँ-वहाँ भटक कर अशान्त बना रहता था । कभी वह स्थिर और कभी चिन्तित रहता था । उसकी ऐसी स्थिति देखकर मुझे दया आ गई और मैने उससे कहा कि कृपया अब आप अपना विश्वास एक इच्छित स्थान पर स्थिर कर लें । इस प्रकार व्यर्थ भटकने से कोई लाभ नहीं । शीघ्र ही एक निर्दिष्ट स्थान चुन लो – इन शब्दों से ठक्कर की समझ में तुरन्त आ गया कि यह सर्वथा मेरी ही कहानी है । उनकी इच्छा थी कि काका भी हमारे साथ ही लौटें । बाबा ने उनका ऐसा विचार जानकर काका को सेठ के साथ ही लौटने की अनुमति दे दी । किसी को विश्वसा न था कि काका इतने शीघ्र शिरडी से प्रस्थान कर सकेंगे । इस प्रकार ठक्कर को बाबा की विचार जानने की कला का एक और प्रमाण मिल गया । तब बाबा ने काका से 15 रुपये दक्षिणा माँगी और कहने लगे कि यदि मैं किसी से एक रुपया दक्षिणा लेता हूँ तो उसे दसगुना लौटाया करता हूँ । मैं किसी की कोई वस्तु बिना मूल्य नहीं लेता और न तो प्रत्येक से माँगता हूँ । जिसकी ओर फकीर (मेरे गुरु) इंगित करते है, उससे ही मैं माँगता हूँ और जो गत जन्म का ऋणी होता है, उसकी ही दक्षिणा स्वीकार हो जाती है । दानी देता है और भविष्य में सुन्दर उपज का बीजारोपण करता है । धन का उपयोग धनोर्पाजन के ही निमित्त होना चाहिये । यदि धन व्यक्तिगत आवश्यकताओं में व्यय किया गया तो यह उसका दुरुपयोग है । यदि तुमने पूर्व जन्मों में दान नहीं दिया है तो इस जन्म में पाने की आशा कैसे कर सकेत हो । इसलिये यदि प्राप्ति की आशा रखते हो तो अभी दान करो । दक्षिणा देने से वैराग्य की वृद्घि होती है और वैराग्य प्राप्ति से भक्ति और ज्ञान बढ़ जाते है । एक दो और दस गुना लो । इन शब्दों को सुनकर श्री. ठक्कर ने भी अपना संकल्प भूलकर बाब को 15 रुपये भेंट किये । उन्होंने सोचा कि अच्छा ही हुआ, जो मैं शिरडी आ गया । यहाँ मेरे सब सन्देह नष्ट हो गये और मुझे बहुत कुछ शिक्षा प्राप्त हो गई । ऐसे विषयों में बाबा की कुशलता बड़ी अद्घितीय थी । यघपि वे सब कुछ करते थे, फिर भी वे इन सबसे अलिप्त रहते थे । नमस्कार करने या न करने वाले, दक्षिणा देने या न देने वाले, दोनों ही उनके लिये एक समान थे । उन्होंने कभी किसी का अनादर नहीं किया । यदि भक्त उनका पूजन करते तो इससे उन्हें कोई प्रसन्नता होती और यदि कोई उनकी उपेक्षा करता तो न कोई दुःख ही होता । वे सुख और दुःख की भावना से परे हो चुके थे । ।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।। *****ENGLISH VERSION***** Kaka Mahajani's Master (contd.) Then Shama introduced Mr. Thakkar as the master of Kaka, upon which Baba said, "How could he be his master? He has got a different Master altogether". Kaka appreciated this reply. Forgetting his resolve, Thakkar saluted Baba and returned to the Wada. After the noon-Arati was over, they all went to the Masjid for taking Baba's leave for their departure. Sharma spoke for them. Baba then spoke as follows. "There was a fickle-minded gentleman. He had health and wealth and was free from both physical and mental afflictions, but he took on him needless anxieties and burdens and wandered hither and thither, thus losing his peace of mind. Sometimes he dropped the burdens and at other times carried them again. His mind knew no steadiness. Seeing his state, I took pity on him and said, "Now please keep your faith on any one place (point) you like, why roam like this? Stick quietly to one place. Thakkar at once came to know that, that was an exact description of himself. He wished that Kaka should also return with him but no one expected that Kaka would be allowed to leave Shirdi so soon. Baba read also this thought to his and permitted Kaka to return with his master. Thakkar got one more proof of Baba's capacity to read another's mind. Then Baba asked Kaka for Rs. 15/- as Dakshina and received it. To Kaka He said, "If I take one rupee as Dakshina from anybody I have to return it tenfold to him. I never take anything gratis. I never ask any one indiscriminately. I only ask and take from him whom the Fakir (My Guru) points out. If any one is indebted formerly to the Fakir money is received from him. The donor gives, i.e. sows his seeds, only to reap a rich harvest in future. Wealth should be the means to work out Dharma. If it is used for personal enjoyment, it is wasted. Unless you have given it before, you do not get it now. So the best way to receive is to give. The giving of Dakshina advances Vairagya (Non-attachment) and thereby Bhakti and Jnana. Give one and receive tenfold". On hearing these words Mr. Thakkar himself gave Rs.15/- in Baba's hand, forgetting his resolve not to do so. He thought he did well in coming to Shirdi as all his doubts were solved and he learnt so much. Baba's skill in handling such cases was unique. Though He did all those things He was totally non-attached to them. Whether anybody saluted Him or not, or whether anybody gave Him Dakshina or not, it was the same to Him. None He disrespected. He felt no pleasure because He was worshipped and no pain because He was disregarded. He transcended the pairs of opposites, viz. pleasure and pain, etc. Bow to Shri Sai - Peace be to all Shubh Life / Om Sai Ram ➭ Share Shirdi Sai Baba Page Link on your wall (www.facebook.com/shirdibabasai) and request all your friends to join.

***Please LIKE & SHARE the post*** -----> Shirdi Sai Baba To the lotus feet of My Sai . . . Sai Satcharitra Chapter 35 (VI) – English & Hindi Version - Shirdi Sai Baba *****HINDI VERSION***** अनिद्रा बान्द्रा के एक महाशय कायस्थ प्रभु बहुत दिनों से नींद न आने के कारण अस्वस्थ थे । जैसे ही वे सोने लगते, उनके स्वर्गवासी पिता स्वप्न में आकर उन्हें बुरी तरह गालियाँ देते दिखने लगते थे । इससे निद्रा भंग हो जाती और वे रात्रिभर अशांति महसूस करते थे । हर रात्रि को ऐसी ही होता था, जिससे वे किंकर्तव्य-विमूढ़ हो गये । एक दिन बाब के एक भक्त से उन्होंने इस विषय मे परामर्श किया । उसने कहा कि मैं तो संकटमोचन सर्व-पीड़ा-निवारिणी उदी को ही इसकी रामबाण औषधि मानता हूँ, रजो शीघ्र ही लाभदायक सिदृ होगी । उन्होंने एक उदी की पुड़िया देकर कहा कि इसे शयन के पूर्व माथे पर लगाकर अपने सिरहाने रखो । फिर तो उन्हें निर्विघ्र प्रगाढ़ निद्रा आने लगी । यह देखकर उन्हें महान् आश्चर्य और आनन्द हुआ । यह क्रम चालू रखकर वे अब साईबाबा का ध्यान करने लगे । बाजार से उनका एक चित्र लाकर उन्होंने अपने सिरहाने के पासा लगाकर उनका नित्य पूजन करना प्रारम्भ कर दिया । प्रत्येक गुरुवार को वे हार और नैवेघ अर्पण करने लगे । वे अब पूर्ण स्वस्थ हो गये और पहले के सारे कष्टों को भूल गये । ।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।। *****ENGLISH VERSION***** Insomnia Case A Kayastha Prabhu gentleman of Bandra suffered from Insomnia for long. As soon as he laid himself down for sleep, his departed father appeared to him in his dream, and abused and scolded him severely. This broke his sleep and made him restless the whole night. Every night this went on and the man did not know what to do. One day he consulted a devotee of Baba in this respect. He recommended the Udi as the only infallible remedy he knew. He gave him some Udi and asked him to apply a little of it to his forehead before going to bed and keep the Udi-packet under the pillow. He tried this remedy and found, to his great surprise and joy, that he got sound sleep and that there was no disturbance of any kind. He continued the remedy and always remembered Sai. Then he got a picture of Sai Baba which he hung on the wall near his pillow and started worshipping it daily and on Thursdays, offering garland, naivedya etc. Then he got on well and forgot altogether his past trouble. Bow to Shri Sai - Peace be to all Shubh Life / Om Sai Ram ➭ Share Shirdi Sai Baba Page Link on your wall (www.facebook.com/shirdibabasai) and request all your friends to join.

Baba's Darshan Today... Click Here -----> Shirdi Sai Baba ***Please LIKE & SHARE the post*** शिर्डी के साँई बाबा जी के दर्शनो का सीधा प्रसारण आज दिनांक (08/06/2013) प्रात काल 0650 बजे ॐ साँई राम जी बाबा जी की कृपा आप सभी पर सदैव बरसती रहे - Shirdi Sai Baba Baba’s live darshan from Sai Dhaam Shirdi today (08/06/2013) @ 0650 Hours in the morning. . . May Baba’s blessings keep flowing to HIS children always !!! - Shirdi Sai Baba If you want to share anything on the Page, please mail us at oursai@saimail.com Keep Promoting the Page amidst your friends and help us grow. Shubh Life / OM Sai Ram