Dwarkadas Thumar

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धर्म पर संकट आया है शंकराचार्य जी ने अपने विचारो एवं उपदेशो से सनातन धर्मियों का मार्गदर्शन किया है. जगद्गुरु शंकराचार्य होने के नाते यह उनका परम दायित्त्व है की वे सभी को धर्म की शिक्षा दे और अधर्म करने से रोके. साईबाबा के सन्दर्भ में भी पूज्य शंकराचार्य जी ने अपने विचार व्यक्त किये हैं. शंकराचार्य जी के विचार तथ्यों एवं प्रमाणों पर आधारित हैं. इसका खंडन भी यदि कोई करना चाहे तो तर्कों एवं प्रमाणों के आधार पर प्रस्तुत करे. उसका स्वागत होगा। यदि किसी को भी शंकराचार्य जी महाराज के विचार को समझने में कोई परेशानी हो रही हो तो इस मंच पर अपने प्रश्न सभ्यता एवं शालीनता के साथ रख सकता है. हमउनके समाधान का प्रयास करेंगे। - स्वामिश्रीः अविमुक्तेश्वरानंद: सरस्वती । जय श्री कृष्ण।

मित्रो , जिस दिन तुम दुखी हो, उदास हो, निराशा महसूस करो । उस दिन बाहर निकलकर ,पुछना किसी दुखी व्यक्ति से कि -- मे आपके लिए क्या कर सकता हू " । किसी की भी सहायता कर देना । तभी आपकी उदासी एक उत्साह में बदल जाएगी, आपका दुख - हर्ष में बदल जाएगा , निराशा आनंद में बदल जाएगी। उस समय आपकी आत्मा मे एक प्रसन्नता होगी । अतः आप सुख चाहते है, तो दूसरों को दे, अगर आप प्रेम चाहते है तो दूसरे को दे, आप धन पाना चाहते है दूसरों को दे । आप जो भी प्राप्त करना चाहते है, वह दूसरों को दे जिन्हे इसकी आवश्यकता है, आपको स्वयं भगवान देंगे । जय श्री राम ।

मित्रो.... भारतीय फिल्म जगत के इतिहास में पहली बार, गौहत्या के विषय पर बन रही फिल्म "अहिंसा" जो कि , गाय की रक्षा व सुरक्षा के प्रति एवं गौहत्या जैसे क्रूर कुत्सित कुकर्म के प्रति समाज मे जागरूकता फैलाती। इस फिल्म को रोकने के लिए , कट्टर इस्लामिक संघठन 'नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट(एन डी एफ) , पूरे प्रयास कर रहा है। इस संगठन का कहना है कि -- 'गाय हिन्दुओ के लिए माता होगी, हमारे लिए नहीं, गौभक्षण हमारे लिए हलाल है, इसलिए ऐसी फिल्म जो गौहत्या का विरोध करती हो , वो बने , हम नहीं चाहते । किन्तु इस फिल्म के समूह ने निर्णय किया है कि -- अगर विरोधी मार्ग में पत्थर फेंकेंगे तो हम उन्हे इकट्ठा करके , उन पर चढ़कर और ऊंचा उठेंगे, इसलिए यह फिल्म "अहिंसा" , 20 जून को , पहले से भी अधिक सिनेमाघरों में रिलीज होगी । अतः सभी हिन्दू भाई इस फिल्म को समर्थन दे , व खबर को आगे बढ़ाये । जय गौमाता, जय गोविंद ।

संसार मे सुख खोजना दुख का कारण है । अर्थात आप संसार से , संसार की विभिन्न वस्तुओ से सुख चाहते है , किन्तु उनसे आप तब तक वास्तविक सुख प्राप्त नहीं कर सकते , जब तक भगवान से आपका प्रेम दृढ़ नहीं होगा, क्यो कि भगवान स्वयं आनंदस्वरूप है। याद रखिए -- जब तक आप अपने भगवान के प्रति प्रेम को , विश्वास को व श्रद्धा को स्थिर नहीं करेंगे एवं जब तक आप अपने धर्म को व अपने शास्त्रो को सम्मान नहीं देंगे , जब तक आप भगवान के स्थान पर किसी अन्य की उपासना करना बंद नहीं करेंगे, तब तक आपकी चिंताए , समस्याए खत्म नहीं हो सकती। आपको क्षणिक सुख मिल भी जाये किन्तु आनंद नहीं मिल सकता, शांति नहीं मिल सकती । अतः स्वयं को केवल श्री भगवान के चरणो का प्रेमी बनाए, तब उनके अहैतू की कृपा से आपको आनंद की वह झलक अवश्य ही प्राप्त होगी , जिसके पश्चात आपको प्रत्येक वस्तु सुख प्रदान करने वाली होगी । ॐ । जय श्री राम

जो भी लोग दरगाहों पर जाकर माथा टेकते है, मन्नत मांगते है , वे लोग अपना धर्म भ्रष्ट करने के साथ साथ श्री भगवान की कृपा से भी वंचित हो जाते है। अतः ख्वाजा गरीब नवाज, अमीर खुसरो, निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह आदि स्थानो पर जाकर कभी सर न झुकाये , क्यो कि हिन्दू धर्म मे मुरदो को पूजना पाप है, और गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है कि जो भी लोग मुर्दों को पूजते है वे मरने के पश्चात भूत-प्रेत बनकर भटकते है। साथ ही ये पीर आदि जो है , वे उन मुस्लिमो की है, जो हमारे पूर्वजो से लड़ते हुये मारे गए थे और मुस्लिम शासको ने उनकी कब्र या दरगाहे बना दी थी । और हम हिन्दू अनजाने में उन्हे पूजने लगे । इस पाप को करना बंद करे । आपका सर केवल और केवल अपने श्री भगवान के चरणो मे झुकना चाहिए, केवल अपने भगवान पर विश्वास बना कर रखे, जिस दिन आप अन्य सब को छोडकर केवल अपने भगवान पर अपना विश्वास स्थिर करने लगेंगे उस दिन से उनकी कृपा का अनुभव आपको होना प्रारम्भ हो जाएगा। जय श्री राम ।

भगवान् श्री कृष्ण ने अपने सम्पूर्ण संघर्षमय जीवन में भी मुस्कुराना नहीं छोड़ा | सम्पूर्ण नीतियाँ उनके जीवन में हैं - उन्होंने दुष्टों को मारने के लिए प्रत्येक नीति का - साम-दाम-दंड व भेद नीतियों का कुशलता पूर्वक प्रयोग भी किया | और एक आज हम लोग हैं जो भगवान् श्री कृष्ण "को" तो मानते हैं पर भगवान् श्री कृष्ण "की" नहीं मानते | केवल प्रेम की बातों को सम्पूर्ण जीवन का सिद्धांत बनाकर कलिकाल में व्यावहारिक जीवन कठिन है ... अतः हमे भगवान् की उन लीलाओं व शिक्षाओ पर भी ध्यान देना चाहिए जिनमें उन्होंने प्रथम-पूज्य बनकर सबको चकित किया , सम्पूर्ण विश्व को बिना लड़े ही नीतियों से जीत लिया (जहां आवश्यकता पड़ी वहाँ दुष्टों को मारा भी ...) आज आवश्यकता है कि हमलोग धर्मनिष्ठ बने और हिन्दुत्त्ववादी ही बनें .... जब तक अपने धर्म के प्रति कट्टर नहीं बनोगे तब हम और आप लोग धर्मच्युत ही हैं .... " कलैव्यं मा स्म गमः पार्थः । श्री कृष्ण कहते है कि सदैव धर्म के पक्ष मे रहो , न तो धर्म के विरोध मे रहो , न ही धर्मनिरपेक्षी रहो । जय श्री कृष्ण.... हर हर महादेव।

भगवा क्या है ? जब व्यक्ति सन्यास लेता है तो चिन्ह के रूप में भगवा धारण करता है, क्यो कि भगवा त्याग का प्रतीक है । शूरवीर इसी भगवे को धारण कर राष्ट्र व धर्म रक्षा के लिए अपने प्राणो का त्याग कर देते है, भगवा शौर्य का प्रतीक है । जहा धर्म है , जहा त्याग है, जहा शौर्य है , जहा तेज है, जहा सत्य है , वहा वहा भगवा है, संकेत के रूप में , चिन्ह के रूप में । भगवान = "भगवा" +न । शुभप्रभात मित्रो .... जय सियाराम । जय हनुमान ।

" जो भी हम खायेंगे वो भगवान को भोग लगाएंगे" ये विधान नहीं है । "जो भगवान को भोग लगाया जाता है, वो हम खाएँगे" ये विधान है ।___________________________शुभरात्रि मित्रो। जय श्री कृष्ण ।

महाभारतकार ने हमे योगेश्वर श्री कृष्ण का जो रूप प्रत्यक्ष कराया है, वह सबका ही पूज्यनीय है, विश्ववंद्य है, परमोज्जवल , पूर्ण सत्य तथा स्तुत्य है। शील एवं सदाचार के अवतार श्री कृष्ण के संबन्ध में महर्षि दयानंद कहते है कि - श्री कृष्ण का इतिहास महाभारत में अत्योत्तम है, उनका गुण-कर्म-स्वभाव चरित्र आप्त पुरुषो के सदृश है। जिसमे कोई अधर्म का आचरण श्री कृष्ण ने जन्म से मरणपर्यंत बुरा काम कुछ भी किया हो ऐसा नहीं है " । भगवान श्री कृष्ण जिन्हौने भारतवर्ष को जरासंघ के अत्याचारमूलक एक सत्तात्मक साम्राज्य से मुक्त कर, अजातशत्रु युधिष्ठिर के आत्म-निर्णय मूलक आर्यसाम्राज्य के सूत्र मे सूत्रित किया। इन्ही भारतरक्षक , धर्मउद्धारक-संस्थापक, पापसंहारक श्री कृष्ण की विभूति के समक्ष समस्त भारत ने सर झुकाया व झुका रहा है। संसार के समूचे इतिहास में सबसे अदभुद तथा आकर्षक श्री कृष्ण का यही योगेश्वर स्वरूप है, इसीलिए हमे यही कृष्ण प्यारे है । गीता के उद्देश्य व तात्पर्य को जानकर श्री कृष्ण के इस स्वरूप को भलीभांति समझा जा सकता है। धनुर्धर पार्थ को इन्ही की कृपा से विजय , लक्ष्मी , ध्रुवनीति का मार्ग मिला। अतः आप चाहते है कि श्री कृष्ण भी आपके जीवन रथ के सारथी बने, तो आपको भी अर्जुन बनना होगा । जय श्री कृष्ण।

शुभ संध्या मित्रो.... इस लेख को एक बार ध्यान से जरूर पढे ---- बालकपन में खूब खेल कून्द लिए, युवावस्था में पढ़ाई , कैरियर 'फन', फिर शादी बच्चे उनका निर्वहन , दुनिया भर का प्रपंच ....क्या आपने कभी यह सोचा कि ये सब आप कौन से लक्ष्य के लिए करते है? यह जीवन स्वयं आपने तो पैदा नहीं किया , जिसने यह मनुष्य जीवन आपको दिया, केवल इसी सब के लिए तो नहीं दिया होगा न ? सोना, खाना, निकालना,भोग करना ये सब तो पशु भी करते है, अतः केवल निरुद्देश्य जीवन जीते रहने के लिए तो यह देह आपको नहीं मिली न । ये कर्तव्य जीवन के अंग है करने चाहिए , लेकिन बस इतना ही ? क्या प्राप्त कर लिया इनसे अब तक या क्या कर लोगे? मृत्यु के पश्चात का जो इस जीवन से लंबा जीवन है, उसके लिए कुछ क्यो नहीं करते ?? 'तुम" मात्र यह शरीर नहीं हो , इसलिए केवल शरीर का सोचना अपनी आत्मा के साथ घात करना है। तुम वास्तव में यह 'आत्मा' हो तो सोचो अपने लिए अब तक तुमने क्या किया ? यह आत्मघाती प्रवर्त्ति हुयी या नहीं । क्या जीवन की पूर्णता इन्ही सब कर्मो को करने में है? यह समस्त सृष्टि के जड़-चेतन पदार्थ तो अपूर्ण है ? जीवन भर आप अपूर्ण के पीछे भागते रहे व अब भी भागे जा रहे है । और जब तक अपूर्ण के पीछे भागते रहोगे तब तक 'पुनरपि जन्मं पुनरपि मरणं' , भटकते रहोगे अनंत काल तक इस योनि से उस योनि तक, कभी कीट, कभी पशु , कभी स्थावर कभी कुछ, भीषण दुख-व्याधियों को झेलते, नारकीय यंत्रणाओ को भोगते। तुम पूर्ण हो तुम्हारी पूर्णता 'उस पूर्ण' को प्राप्त करने में ही है। अतः नियत सभी सांसारिक कर्मो को करते हुये, अपने सभी कर्तव्यो का निर्वहन करते हुये , उस पूर्ण को भी जानो, जो सर्वत्र व्याप्त है। जिसने समस्त सृष्टि को रचा है , तुम्हें बनाया है। अपूर्ण से पूर्ण की ओर बढ़ो....मृत्यु से अमरत्व की ओर बढ़ो..... विषाद से आनंद की ओर बढ़ो.....क्लेश से सदैव स्थिर रहने वाली शांति की ओर बढ़ो..... अन्यथा व्यर्थ है जो अपने पूर्व के शुभ कर्मो के फलस्वरूप मनुष्य की देह पायी, और इसे भी यू ही गवा दिया... । क्या ज्ञान से विमुख हो, धर्म से विमुख हो, ईश्वर से विमुख हो , स्वयं को अज्ञान के अंधकार मे भटकाते रहना अपनी आत्मा के साथ घात करना नहीं हुआ? कही आप आत्मघाती तो नहीं ? देखिये , अतः आत्मघाती प्रवृत्ति को त्यागकर, आत्मज्ञानी बनने की ओर अग्रसर होना ही स्वयं के साथ न्याय करना है। अतः विद्वानो का, ब्राह्मण आचार्यो का , सच्चे ज्ञानी संतो का शीघ्रातिशीघ्र आश्रय लीजिये...और स्वयं को जानिए , उस 'सत्य' को जानिए। मृत्यु तो आकाश के सदृश सब ओर है, जाने कब किधर से आ जाये, वो एक क्षण का विलंब नहीं करती, आप भी इतना विलंब न करो , जब तक अज्ञान मे हो तब तक मृत्यु है , रहेगी , ज्ञान में सदैव ही जीवन है...। ॐ । जय श्री राम । —

हर प्राणी में प्रभु बसे हैं, क्षण भर हम से दूर नहीं। देख सके न इन आँखों से, इन आँखों में नूर नहीं॥ उन्हे दिखेंगे जो मन में , प्रेम की ज्योति जलायेंगे। निर्मल मन के दर्पण में, वह प्रभु का दर्शन पायेंगे॥........ शुभ रात्रि मित्रो... जय सियाराम ।

कितनी करुणा कितने संदेश पथ में बिछ जाते बन पराग गाता प्राणों का तार तार अनुराग भरा उन्माद राग आँसू लेते वे पथ पखार जो तुम आ जाते एक बार...... शुभरात्रि मित्रो । जय श्री कृष्ण।

पास नहीं कुछ भी देने को नश्वर तन की सेवा ले लो पूजा की विधियाँ क्या जानू चरणों में यह माथा ले लो मृत प्राण मेरे जी उठे अचानक ऐसा अमृत पावन दे दो निर्धन मन धनवान हो जाए ऐसा दिव्य समर्पण दे दो____शुभप्रभात मित्रो । आप सभी का दिन प्रभुकृपा से मंगलमय हो । जय सियाराम ।

मैंने कभी 'तुम्हें' देखा नहीं , पर में ये सोच कर हर्षित हो उठता हू कि तुम्हारी दृष्टि हर समय मुझ पर है । मैंने कभी 'तुम्हें' सुना भी नहीं , पर में ये सोच कर रोमांचित हो उठता हू कि तुम मेरे वाणी और मौन दोनों स्वरो को सुनते हो। में तुम्हें जानता भी नहीं हू , पर में गर्वित हो उठता हू सोचकर कि, 'तुम' तो मुझे जानते हो । मुझे तुम सुख दो या दुख , फर्क नहीं पड़ता - में यही सोच कर आनंदित हो जाता हू कि , 'तुम' मुझे दे रहे हो। में नहीं जानता मुझमें इतनी सामर्थ्य , योग्यता है या नहीं कि , में तुम्हारा बन सकु' तुममे स्थित हो सकु .... पर ये सोचकर में समाधिस्थ हो जाता हू कि ' तुम तो मेरे ही हो' , नित्य मुझमे स्थित हो । ॐ । जय श्री कृष्ण।

तेरे काँटों से भी प्यार, तेरे फूलों से भी प्यार। तेरे विरह से भी प्यार, तेरे मिलन से भी प्यार जो भी देना चाहे दे दो , हे जग के पालनहार।....... शुभरात्रि मित्रो। ॐ । जय श्री कृष्ण।

भगवान पुरूषार्थियों का साथ देते है, कायरो या निकृष्टों का नहीं। भगवान ने अर्जुन का साथ दिया था, शिखंडी का नहीं । इसलिए पुरुषार्थी बनो, अपने धर्म के प्रति अपने भगवान के प्रति निष्ठावान बनो । जय श्री कृष्ण।

पाप व पुण्य की बहुत सरल व सटीक परिभाषा ---- देखो... यदि हमारे विचार या कर्म किसी दूसरे व्यक्ति को हानि पहुचाते है, तो यह पाप है। और अगर हमारे कर्म या विचारो से किसी का लाभ हो रहा है तो ये पुण्य है। आप अपने कर्मो से या विचारो से दोनों प्रकार से पुण्यप्राप्त करते है । कर्मो से सेवा, दान, परोपकार आदि के द्वारा पुण्य अर्जित कीजिये । और विचारो से - धर्म, ज्ञान आदि के श्रेष्ठ विचारो का प्रचार करके पुण्य प्राप्त कीजिये। पाप नरक का मार्ग तैयार करते है, पुण्य भगवान की शरण में जाने का । जय सियाराम। शुभरात्रि।

देखो... वह ईश्वर हमारे इतना पास है कि उसकी तुलना में हदय की धड़कने भी दूर लगती है, और वही इतना दूर भी है कि पूरा जन्म उन्हे पाने के लिए छोटा पड़ जाता है। वह बाहर भी है और भीतर भी है, वही मार्ग है मंजिल भी वही है। ईशावास्यमिदं सर्वं...वह सब ओर है , सबमे है । उनके और हमारे बीच बस एक ही पर्दा है -- अज्ञान का पर्दा..... अज्ञान के नष्ट होने और ज्ञान के प्रकट होने पर , जीव उन्ही में मिल जाता है । अतः विद्वान ब्राह्मणो से ज्ञान प्राप्त कीजिये । शुभरात्रि मित्रो ... ॐ। जय श्री कृष्ण।

बहुत महत्वपूर्ण समाचार---- धर्मगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द जी ने बयान दिया है कि ---- "शिरडी के साईं बाबा की पूजा गलत है। यही नहीं शंकराचार्य ने साईं बाबा के मंदिर बनाने को भी गलत करार दिया। साईं को लेकर सिर्फ पैसा इकट्ठा किया जा रहा है जबकि वो भगवान नहीं है। शंकराचार्य स्‍वामी स्‍वरूपानंद सरस्‍वती ने शिरडी के साईं बाबा को हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक मानने से भी इंकार किया। " मित्रो.... साई एक मुस्लिम फकीर थे, जो मांस खाया करते थे, मांस का प्रसाद बांटके हिन्दुओ के धर्म को भ्रष्ट करते थे। हिन्दू धर्म के शास्त्रो के अनुसार साई की पूजा करना पाप है । गीता के अनुसार , साई बाबा जैसे लोगो को पूजने वाले मरने के पश्चात भूत-प्रेत आदि योनियो मे जाकर भटकते है । इस बात को अपने सभी मित्रो - परिचितों को बताए, और साई के पाखंड को हटाकर पुण्य का काम करे। अपने भगवान की पूजा करे। जय श्री राम ।

धर्म ही मनुष्यका जीवन-प्राण है और इस लोक तथा परलोक में कल्याण करने वाला है । परलोक में तो केवल धर्म ही साथ जाता है ; स्त्री, पुत्र और सम्बन्धी आदि कोई भी वहाँ साथ नही जा सकते । अतएव अपने कल्याण के लिए मनुष्यमात्र को नित्य-निरन्तर धर्म का संचय करना चाहिए । उक्त धर्म की प्राप्ति धर्म के ज्ञाता महापुरुषों के संग से और उनकी अनुपस्थिति में सत-शास्त्रों के अनुशीलन से होती है । जय सियाराम ।

श्री कृष्णाय वासुदेवाय देवकीनन्दनाय च। नन्दगोपकुमाराय गोविंदाय नमो नमः: ॥ ..... भगवान की कृपा से सब सुखी रहे, निरोगी रहे, सब निर्भय हो, आर्य हो ..... शुभरात्रि मित्रो । जय श्री कृष्ण।

दुर्भाग्य है कि विनाश के पथ पर अग्रसर हिन्दूप्रजाति का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा यह भी नहीं जानता कि उसके धर्म के सर्वोच्च ग्रंथ 'वेद' है। इतनी प्रचुर मात्रा में धार्मिक-साहित्य-प्रकाशन , लाखो उपदेशको-प्रवचनकर्ताओ, और धार्मिक हिन्दू संघठनों के होते हुये भी इसके विषय मे जनता की अनभिज्ञता , अपनी मूल संस्कृति के साथ किया जा रहा विश्वासघात है । हमारी निकृष्टता का इससे बड़ा प्रमाण और क्या होगा? अतः इस तथ्य से सभी जागरूक धर्मप्रेमी बंधु सबको परिचित कराने का संकल्प ले हमारा सनातन धर्म वेदाधारित ही है, 'वेदोऽखिलो धर्ममूलं ' कहते हुये मनुस्मृति ने वेदो को ही धर्म का मूल कहा है । एकस्वर मे सभी ऋषियों की उद्घोषणा यह ग्रंथवाक्य है -- "वेदप्रणिहितो धर्मो ह्यधर्मस्तद्विपर्यय:" , अर्थात वेद भगवान ने जिन कार्यो को करने की आज्ञा दी है, वही धर्म है , और वेद के विपरीत करना अधर्म है। इसके अतिरिक्त हमारे समूचे शास्त्रसमूह ने वेदो की सर्वश्रेष्ठता स्वीकार की है। सनातन वैदिक धर्म के अन्य सभी धर्मग्रंथ जैसे गीता आदि स्वतःप्रामाण्य नहीं माने जाते, अन्य ग्रंथ भी श्रेष्ठ मान्य व प्रमाण तो है किन्तु उनका प्रमाण व मान्यता उनके वेद-मूलक होने से ही है। हमारे धर्म के सभी ग्रंथो का , मान्य आचार्यो का स्पष्ट मत है कि -- वेदविरुद्धत्वात् वचन धर्म के विषय में प्रमाण नहीं माने जा सकते बेशक वो स्वयं भगवान ने ही क्यो न कहे हो। यही कारण था कि बुद्धदेव को भगवान मान लिया किन्तु उनके वेदविरुद्ध वचनो को सभी आचार्यो ने साधुओ ने वेदविरुद्ध होने के कारण अस्वीकृत कर दिया। अतः दोपहर के सूर्य के समान इस प्रखर सत्य को जानो व आगे बढ़ाओ कि --- " जैसे दैत्यसंस्कृति का अधर्मप्रसारक मूल कुग्रंथ 'कुरान' है। भोगसंस्कृति का अज्ञानप्रसारक मूल कुग्रंथ 'बाइबिल' है। हमारी विश्व की सबसे प्राचीन देवसंस्कृति , हमारे ईश्वरीय धर्म के सत्यज्ञान प्रसारक मूल व सर्वोच्च ग्रंथ 'वेद' है। ॥ओम्॥ । जय श्री राम।

जहा धर्म है वही विजय है, जहा सत्य है वहा न भय है । मोह न सम्मुख आने पाता, संशय जोड़ न पाता नाता । सत्य का पालन करो, धर्म का पालन करो -- तुम मोह संशय भय आदि विकारो से सर्वथा मुक्त होकर विजय को प्राप्त करोगे, भगवान के श्री चरणो का आश्रय प्राप्त करोगे। बाकी तो जैसे दूध में नींबू की एक बूंद मात्र पड़ने से दूध फट जाता है , इसी तरह अपने संचित पुण्य कर्म-भक्ति रूपी दूध मे, साई रूपी नींबू की बूंद मात्र पड़ने से ,पुण्य कर्म भक्ति आदि नष्ट हो जाते है । अतः साई के पाखंड से उपजी इस अर्धमुस्लिम वृत्ति का त्याग करो व कराओ । केवल अपने सत्यधर्म व सत्यईश्वर के प्रति पूर्णनिष्ठावान रहो। यही कल्याण का मार्ग है। जय सियाराम ।

ईश्वर के प्रति आस्था श्रद्धा और प्रेम इतना कमजोर नहीं होना चाहिए कि अपनी मन्नते मनवाने के लिए स्वार्थवश होकर आप एक फकीर को भगवान श्री राम,श्री कृष्ण , शिव से भी बड़ा मानना शुरू कर दे। ऐसी कोई इच्छा नहीं है जिसे आपके भगवान पूरा नहीं कर सकते। किन्तु जो भगवान को छोडकर किसी मृत व्यक्ति की शरण मे जाते है , उनका न इस लोक मे कल्याण होता है न उस लोक में । अतः अपने भगवान पर विश्वास रखे व कलयुगी पाखंड के बहकावे मे न आए । जय श्री कृष्ण।

साई को भगवान मानकर उसके लिए श्रद्धा रखना बहुत बड़ा पाप है, इस विषय मे भगवान कृष्ण ने क्या कहा है .... पूरा पढे व अन्य को बताए । गीता के सातवे अध्याय में अर्जुन पूछते है - हे कृष्ण , जो मनुष्य शास्त्रवर्णित ईश्वर को छोड़, शास्त्रविधि के विरुद्ध अपनी श्रद्धा से किसी अन्य किसी की उपासना करते है , तो उनकी यह उपासना कैसी हैं ??? भगवान श्री कृष्ण कहते है - "त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा" -- अर्थात मनुष्य में जो शास्त्रीय संस्कार से रहित श्रद्धा उत्पन्न होती है वह तीन प्रकार की है , सात्विकी , राजसी और तामसी । आगे कहते है - " यजन्ते सात्विका देवान् यक्षरक्षांसि राजसा:। _ _ अर्थात -- सात्विक मनुष्य देवो को पूजते है, राजस पुरुष यक्ष आदि को , और तामस मनुष्य, मरे हुये व्यक्तियों भूत प्रेत आदि को पूजते है । उपरोक्त वर्णन से स्पष्ट है कि जो साईभक्त "श्रद्धा श्रद्धा " का राग अलापते है, उनकी इस कथित श्रद्धा को भगवान श्री कृष्ण तामसिक वृत्ति कह रहे है । ऐसी केवल स्वभाव से उत्पन्न तामसिक श्रद्धा कल्याण का नहीं अपितु पतन का मार्ग खोलती है । इस तामसिक श्रद्धा के उत्पन्न होने से मनुष्य की श्रद्धा मरे हुये व्यक्तियों अथवा भूत-प्रेत आदि के प्रति बन जाती है । कृष्ण कहते है -- " मां चेवांत:शरीरस्थं तान् विद्दयासुरनिश्चयान् -- अर्थात -- ऐसे आसुरी स्वभाव व तामसी श्रद्धा वाले मनुष्य , अपनी अज्ञानता के चलते मुझे भी कृश करते है अर्थात , मुझे भी क्लेश पहुचाते है। ऐसे मनुष्य अवहेलनापूर्वक शास्त्रो के मत का त्याग करके , अपनी समझ से जो अच्छा लगता है , वही करते है। इन यथेच्छाचारी मनुष्यो की श्रद्धा , पूजा व कर्म शास्त्रनिषिद्ध होते है। ऐसे तामस पुरुषो को नरकादि दुर्गति प्राप्त होती है। ये अपनी तामसिक श्रद्धा के वश में हो लोभ से भरे , अपना पापमय जीवन बिताते है, और अंततः नाना दुखो को भोगते हुये, अंधकार से आच्छादित कष्टमय लोको मे भ्रमण करते ,नरकादि के भीषण दुखो को भोगकर , भूत-प्रेतादि व कूकर, शूकर जैसी निकृष्ट योनियो को प्राप्त करते है । और जो अपने शास्त्रो पर श्रद्धा व आस्था रखते हुये, उनके कथानुसार अपने श्री भगवान के चरणो का आश्रय लेते है । वे अपने लोक व परलोक दोनों का उत्थान करते हुये अंततः श्री भगवान को ही प्राप्त हो जाते है ॥ॐ॥ । जय श्री राम।

जब लक्ष्मण जी को युद्ध में मूर्च्छा आ गयी और हनुमान जी वैद्य सुशैण को घर समेत युद्ध क्षेत्र में ले आये तो वैद्य सुशैण बोले मैं वैद्य दशानन के घर का, किस तरह आपका काम करूँ | होगा अनुचित जो स्वामी के बैरी को मैं आराम करूँ || जिसमे प्रत्यक्ष बुराई है, वह कर्म किया कैसे जाए | हे राम ये आज्ञा देते हो, ये अधर्म किया कैसे जाए || तो भगवन श्री रामचन्द्र कहते है की -- जिस धर्म की खातिर राज्य गया, और पितृ देव का मरण हुआ | जिस धर्म की खातिर भ्रात छुटा , सीता प्यारी का हरण हुआ || उस धर्म की खातिर लक्ष्मण भी , यदि मरता है तो मर जाए | आवाज राम की होगी यह, पर धर्म नहीं जाने पाए || बस अगर हम सभी में वैद्य सुशैण जी जैसी ही देशभक्ति आ जाए और प्रभु श्री राम जैसी ही धर्मभक्ति आ जाए तो देश व धर्म पर कोई संकट आ ही न पाए | अतः हम सभी को देश व धर्म की रक्षा करने से कभी पीछे नहीं रहना चाहिए...... ॐ

भगवान शिव व माता पार्वती का विवाह श्रावण मास में ही हुआ था। संसार की रक्षा हेतु हलाहल विष का पान भी भोलेनाथ ने सावन के महीने मे ही किया था। ऐसे ही कुछ कारणो से भगवान शंकर को यह मास बहुत प्रिय है एवं वे ही इसके प्रधान देवता है, अतः इस समय में भगवान शिव की की गयी उपासना या कोई भी अच्छा कर्म कई गुना अधिक फल देने वाला होता है। एवं आप सभी से अनुरोध है कि इस पावन मास में भगवान शिव के साथ मातापार्वती का नाम जोड़े किसी म्लेक्ष साई आदि का नहीं। ऐसे पाप से बचे....। शुभप्रभात । आप सभी का दिन मंगलमय हो । जय जय शंकर.... जय गंगाधर .... हर हर महादेव ।

भगवान की शक्ति के एक छोटे से अंश के कारण ही वाणी बोल पाती है, कान सुन पाते है , मन मनन कर पाता है और बुद्धि निश्चय कर पाती है , अतः इन इंद्रियो के द्वारा या किसी भी प्राकृतिक माध्यक के द्वारा उस ईश्वर को नहीं जाना जा सकता । क्यो कि ये सभी सीमित है और परमात्मा अनंत । अतः उस परमात्मा को केवल शास्त्रो के आदेशो का पालन करते हुये, आत्मा के द्वारा ही जाना जा सकता है। अर्थात अपनी आत्मा को परमात्मा मे स्थित कर देने पर ही वह जाना हुआ होता है । ऐसा उपनिषद कहते है । जय श्री कृष्ण।

हमारे शरीर के भीतर जो आत्मा है , वह न तो स्त्री है , न पुरुष है और न नपुंसक है। यह जीवात्मा जब जब जिस शरीर को ग्रहण करता है , उस समय उससे संयुक्त होकर वैसा ही बन जाता है। जो जीवात्मा आज स्त्री है , वही दूसरे जन्म में पुरुष हो सकता है , और जो आज पुरुष है , वो अगले जन्म में स्त्री हो सकता है । अर्थात स्त्री , पुरुष और नपुंसक यह भेद शरीर को लेकर है , जीवात्मा सर्वभेदशून्य है , सारी उपाधियों से रहित है । अतः बुद्धिमान कभी भी स्वयं के पुरुष होने या स्वयं के स्त्री होने पर वृथा अभिमान नहीं करते । ओम् । जय श्री राम ।